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काले मेघा! काले मेघा ! इतना क्यूँ तरसाए ?

Posted On: 2 Jul, 2012 में

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काले मेघा! काले मेघा ! इतना क्यूँ तरसाए ?
बहुत हुई अब देर सही, पर अब क्यूँ न बरसे हाय !
गरमी से परेशां जनता सब बोले हाय!! हाय!!

काले मेघा बोले तब तू( जनता) क्यूँ न पेड़ लगाये?
जब बारिश की इतनी आस तो क्यूँ प्रदुषण फैलाये?
जहाँ देखो वहां, तू पेड़ ही पेड़ कटवाए!
फिर हमसे पूछे, हम क्यूँ न बरसे हाय!

इसे बात पर चलो दोस्तों, हम सब पेड़ लगाये !
दुर्घटना से देर भली, पर अब तो चेत जाएँ!!
इस धरती को स्वर्ग बनाने के प्रयास में जुट जाये!!
आओ सब मिल जुल कर एक बेहतर भविष्य बनायें !!



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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
July 4, 2012

इस धरती को स्वर्ग बनाने में हमसब जुट जाएँ , आओ मिलजुल कर भविष्य निज स्वर्णिम आज बनाएं |…….वर्तिका जी,मंगल भावनाओं से भरी कविता के लिए बधाई ! शुभकामनाओं सहित…… सादर !

    vartika के द्वारा
    July 5, 2012

    धन्यवाद आचार्य विजय गुंजन जी !

yogi sarswat के द्वारा
July 4, 2012

इस परार्थना में मैं भी आपके साथ हाथ उठाकर दुआ करता हूँ , की अब तो आओ बादल भाई कितना पकाओगे ! बढ़िया और समसामयिक शब्द

    vartika के द्वारा
    July 4, 2012

    धन्यवाद योगी जी !! अब तो प्रार्थना से ही बात बनेगी !!

rekhafbd के द्वारा
July 3, 2012

वर्तिका जी , काले मेघा! काले मेघा ! इतना क्यूँ तरसाए ? बहुत हुई अब देर सही, पर अब क्यूँ न बरसे हाय !सच में बहुत तरसा रहें है काले मेघा ,सुंदर अभिव्यक्ति

    vartika के द्वारा
    July 3, 2012

    धन्यवाद् रेखा जी !!

yamunapathak के द्वारा
July 3, 2012

बहुत सुन्दर सन्देश है. हर पंक्ति प्रेरित करती है.

    vartika के द्वारा
    July 3, 2012

    धन्यवाद् यमुना जी !!

vartika के द्वारा
July 3, 2012

उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद् मोहिंदर कुमार जी एवम सिंह जी !!

Mohinder Kumar के द्वारा
July 3, 2012

वर्तिका जी, पेड कट रहे हैं, कंक्रीट के जंगल बढ रहे हैं, वाहनों से निकलता प्रदूषण और गर्मी, घर में लगे उपकरणों (फ़्रिज, ऐ.सी.) से निकलती गर्मी…मेघा बेचार तो ऐसी जगह जाने से भी घबराने लगे हैं.. प्यास कौन बुझायेगा इस धरा की. सार्थक रचना के लिये बधाई.

    vartika के द्वारा
    July 3, 2012

    उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद् मोहिंदर कुमार जी!!

jlsingh के द्वारा
July 3, 2012

सड़कों को चौड़ा करने में कितने पेड़ कटाए! नए नगर नित बसते जाते जंगल नहीं सुहाए ! काले मेघा क्यों न भागे स्वर्ग कहाँ पे पाए ? आदरणीय वर्तिका जी, आपकी बातों से पूरी तरह सहमत पर, हम सब हो गए सुविधाभोगी शुद्ध हवा न भाए!

    vartika के द्वारा
    July 3, 2012

    उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद् सिंह जी !!

shashibhushan1959 के द्वारा
July 2, 2012

आदरणीय वर्तिका जी, सादर ! बहुत अच्छा मानव – मेघ संवाद ! तरुवर ह्त्या के घातक कुपरिणामों का फल तो हमें ही भुगतना होगा ! सार्थक सन्देश !

    vartika के द्वारा
    July 3, 2012

    धन्यवाद ! शशि भूषण जी !आप के कथन से मैं सहमत हूँ पर हमें अपने स्तर पर कोशिश करते रहनी चाहिए!

meenakshi के द्वारा
July 2, 2012

वर्तिका , छोटी सी कविता भाव बड़े भारी , बधाई ! मीनाक्षी श्रीवास्तव

    vartika के द्वारा
    July 3, 2012

    उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद् मीनाक्षी जी!


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